आधुनिक वैज्ञानिक युग में प्रार्थना का महत्व Importance of prayer in the modern scientific age

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प्रार्थना से बड़ा बल, विश्वास, प्रेरणा, आशा और सही मार्गदर्शन मिलता है ।

जब भी कोई व्यक्ति प्रार्थना के लिए अपने हाथ उठाता है, तब वास्तव में वह अपने भीतर की शक्ति को जगा रहा होता है। प्रार्थना से उसमें मुश्किलों का सामना करने का आत्मबल आता है।

प्रार्थना एक धार्मिक क्रिया है जो ब्रह्माण्ड की किसी ‘महान शक्ति’ से सम्बन्ध जोड़ने की कोशिश करती है। प्रार्थना व्यक्तिगत हो सकती है और सामूहिक भी। इसमें शब्दों (मंत्र, गीत आदि) का प्रयोग हो सकता है या प्रार्थना मौन भी हो सकती है।

आधुनिक वैज्ञानिक युग में प्रार्थना का महत्व

प्रार्थना ब्रह्माण्ड की किसी ‘महान शक्ति’ से सम्बन्ध जोड़ती है

प्रार्थना व्यक्ति को आंतरिक संबल प्रदान करती है

प्रार्थना मन को प्रसन्न और निराशा को दूर होती है

प्रार्थना मानसिक तनाव दूर करती है

प्रार्थना मन में सकारात्मक विचार पैदा करती है

प्रार्थना में शरीर, मन व वाणी तीनों अपने आराध्य देव की सेवा में एक रूप होते हैं तो वह सीधी परमात्मा के पास पहुँचती है। हृदय की आकुल पुकार है– प्रार्थना। सच्चे मन से की गई प्रार्थना चमत्कारिक होती है। भक्तप्रह्लाद की प्रार्थना ही थी जो हर संकट में उसकी रक्षा करती रही। ध्रुव ने प्रार्थना की शक्ति से ही वन में भगवान् के साक्षात दर्शन किए।

प्रार्थना मनुष्य की श्रेष्ठता की प्रतीक है क्योंकि यह उसके और परमात्मा के घनिष्ठ संबंधों को दर्शाती है । हरएक धर्म में प्रार्थना का बड़ा महत्व है । सभी धर्म-गुरुओं, ग्रंथों और संतों ने प्रार्थना पर बड़ा बल दिया है । उन्होंने प्रार्थना को मोक्ष का द्वार कहा है ।

प्रार्थना में परमेश्वर की प्रशंसा, स्तुति, गुणगान, धन्यवाद, सहायता की कामना, मार्गदर्शन की ईच्छा, दूसरों का हित चिंतन आदि होते हैं । प्रार्थना चुपचाप, बोलकर या अन्य किसी विधी से की जा सकती है । यह अकेले और सामूहिक, दोनों रूपों में होती है । यह ध्यान के रूप में या किसी धर्म ग्रंथ के पढ़ने के रूप में भी हो सकती है ।

प्रार्थना में माला, जाप, गुणगान पूजा संगीत आदि का सहारा लिया जाता है । बिना किसी ऐसे साधन के भी प्रार्थना की जा सकती है । प्रार्थना करने की कोई भी विधि अपनाई जा सकती है, और सभी श्रेष्ठ हैं । प्रार्थना एक तरह से परमेश्वर और भक्त के बीच बातचीत है । इस में भक्त भगवान को अपनी सारी स्थिति स्पष्ट कर देता है कुछ छिपाता नहीं ।

इसमें जितनी सच्चाई, सफाई, तन्मयता और समर्पण-भाव होगा, वह उतना ही प्रभावकारी होगी । प्रार्थना कभी भी और कहीं भी की जा सकती है, परन्तु प्रात: और सायं नियमित रूप से करना बहुत लाभदायक रहता है । प्रार्थना का स्थान भी शांत, स्वच्छ, मनोरम, और खुला होना चाहिये ।

यह ऐसा होना चाहिये कि ध्यान नहीं बंटे और जहां शोरगुल न हो । मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि इसके लिए अच्छे स्थान माने जाते हैं । प्रकृति की गोद में भी, कहीं भी, प्रार्थना करने में बड़ी सहायता मिलती हैं । प्रार्थना में मन की एकाग्रता बहुत आवश्यक है ।

प्रार्थना से बड़ा बल, विश्वास, प्रेरणा, आशा और सही मार्गदर्शन मिलता है । ऐसा करने से विनाश होता है और मानवीय गुण जैसे दया, अहिंसा, ममता, परोपकार, सहनशीलता, सहयोग, सादगी, उच्च विचार आदि पैदा होते हैं, उनका विकास होता है । विपत्ति, निराशा और संकट के समय प्रार्थना से बड़ा बल, आत्मविश्वास और शांति मिलती हैं । प्रार्थना से उलझनें सुलझ जाती हैं, शक्ति मिलती है, दु:ख के बादल छंट जाते हैं, और अंधकार में प्रकाश मिल जाता है ।

इस प्रकार प्रार्थना का मनोवैज्ञाकि महत्व भी कम नहीं है । मन की शांत करने, बुद्धि को एकाग्र करने, संस्कारों को श्रेष्ठ बनाने और आत्मविश्वास प्रापत करने का यह एक अनुपम साधन है । यह एक ऐसी आध्यात्मिक क्रिया है जिसमें धैर्य, ऊर्जा, पवित्रता, चरित्र की दृढ़ता जैसे गुण विद्यमान हैं । इसके द्वारा दूसरों का भी बड़ा भला किया जा सकता है । प्रार्थना के बल पर संतों, साधुओं, पैगम्बरों, आदि ने वह सब कुछ कर दिखाया है जो असंभव लगता है ।

महात्मा गांधी प्रतिदिन अपना बहुत समय प्रार्थना में बिताते थे । वे प्रार्थना के महत्व को भलीभांति समझते थे । शाम को प्रतिदिन वे सार्वजनिक प्रार्थना सभा करते थे । उन जैसा नैतिक साहस वाला दूसरा व्यक्ति आज तक 20वीं शताब्दी में नहीं हुआ । यह सब प्रार्थना का ही प्रभाव था ।

वे मानते थे कि प्रार्थना व्यक्ति को उसकी तुच्छता का एहसास कराकर विनम्र बनाती है, चरित्र उत्रत करती है, और निराशा में आशा का संचार करती है । वे कहते थे कि प्रार्थना अपने हृदय की खोज है, जो हमें बताती है कि ईश्वर के बिना हम बिल्कुल पंगु और असहाय हैं । वे कहते थे कि अपना दिन प्रार्थना से प्रारंभ करो और उसका अंत भी प्रार्थना से ।

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